Tuesday, June 7, 2016

हम तो आये थे, पंजाबिन ने डांटकर भगा दिया

नैनीताल की श्रीमति विधा शाह ने एक दिन मन में सोचा कि महाराज आप सब के घर आते है, मेरे घर भी आओ किसी दिन पर संकोचवश कह नहीं पायी। आपका घर बाज़ार में था, संकरी सीढ़ियाँ थी आपकी। बाबा का डील- डोल देख कर आपको लगा कि बाबा के लिये उपर सीढ़ियाँ चडना मुश्किल है। अचानक आप के मन की बात जानते हुए बाबा स्वत: बोल उठे," हम तेरे घर आयेंगे, तू हवन करवा।"

आपने मंदिर के पुजारी से हवन का अनुष्ठान करवाया। जिस दिन पूर्णाहूति हुई आप प्रसाद लेकर घर आ रही थी तो देखा कि रास्ते भर एक दुबला पतला साधू आपके पीछे पीछे चला आ रहा है। इससे आपको कुछ मानसिक परेशानी हुई। वे बराबर आपके पीछे चल रहा था। घर आने का रास्ता जो कि एक पंजाबी परिवार के घर से होकर जाता था, वहाँ आप सीढियों से ऊपर चढ़ गयी। उस साधू को उनके पीछे देखकर, पंजाबी परिवार ने उसे ढांट कर भगा दिया। हालांकि उनकी समझ में नहीं आया कि वो साधू पीछा क्यूँ कर रहा है।

इस घटना के कुछ समय बाद आप बाबा के पास बैठी थीं कि आपके मन में ख़्याल आया कि बाबा ने घर आने की बात कहीं थी उनके कहे अनुसार यज्ञ भी करवाया पर बाबा नहीं आये। इस पर बाबा तुरंत बोल उठे" हम तो आये थे, पर तेरे यहाँ पंजाबिन ने हमें भगा दिया।" आप बाबा को पहचान न पाई, अपने पर आपको बहुत ग्लानि हुई। बाबा तो किसी भी रूप में आपको मिल सकते है, बस आप पहचान लीजियेगा।

Tuesday, December 22, 2015

बाबाजी ने बचाई जिन्दगी

अल्मोड़ा में एक दिन दिवाकर पंत बहुत बुरी तरह बीमार हो गये। आधी रात होते होते उनकी हालत बहुत नाजुक हो गयी। पहाड़ में इतनी रात किसी डॉक्टर को बुलाना भी संभव नहीं था। सब सुबह होने का इंतजार कर रहे थे। उनकी हालत लगातार बिगड़ती जा रही थी। उनकी पत्नी रोते रोते बदहवास होकर गिर पड़ीं।

तभी उन्होंने महसूस किया जैसे महाराज जी उनका कंधा पकड़कर हिला रहे हैं और एक दवा की तरफ इशारा करते हुए कह रहे हैं कि "यह दवा दे दो। वह ठीक हो जाएगा। "

उन्हें यह सोचने का भी होश नहीं था कि अचानक बाबाजी कब आ गये? कमरे में उनके अलावा किसी और ने बाबाजी को देखा भी नहीं। वे उठीं और बाबाजी ने जिस दवा की तरफ इशारा किया था वह दवा पिला दी। दवा देते ही दिवाकर पंत के व्यवहार में अजीब सा बदलाव आ गया। वे हिंसक हो गये और अनाप शनाप बकने लगे। ऐसे लग रहा था जैसे उनके दिमाग का संतुलन बिगड़ गया है। सब उनकी पत्नी के व्यवहार को कोस रहे थे कि बिना जाने समझे उसने कौन सी दवा दे दी। खुद उनकी पत्नी को भी पता नहीं था कि उन्होंने कौन सी दवा दे दी है। उन्हें न दवा का नाम पता था और न डोज।

खैर, अगली सुबह डॉ खजानचंद आये। रोगी की जांच करने के बाद उन्होंने वह सब वाकया बड़े धैर्य से सुना जो रात में घटित हुआ था। उन्होंने कोरोमाइन नामक दवा की वह शीशी भी देखी जिसमें से रात में रोगी को उनकी पत्नी ने दवा पिलाई थी। सब सुनने के बाद उन्होंने दिवाकर पंत की पत्नी से पूछा, बेटी तुमने यह दवा क्यों दी?

मारे शर्म और अपराधबोध के वो कोई जवाब न दे सकीं। बस बुरी तरह रोये जा रही थीं। तब डॉक्टर ने उनकी पीठ थपथपाते हुए कहा कि "यह दवा देकर तुमने अपने पति की जान बचा ली। उस वक्त सिर्फ यही एक दवा थी जो रोगी को दी जा सकती थी।" डॉक्टर ने कहा, अब वे ठीक हो जाएंगे। घबराने की कोई बात नहीं है।

#महाराजजीकथामृत

(रवि प्रकाश पांडे (राजीदा),  द डिवाइन रियलिटी, दूसरा संस्करण, (१९९५), पेज- १०७/१०८)

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🌺 जय जय नींब करौरी बाबा। 🌺
🌺 कृपा करहु आवई सद्भावा।। 🌺
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Tuesday, December 15, 2015

कंजूस का धन

बात 1966 की है। तब कैंची नदी पर इतना बड़ा पुल नहीं था। एक लकड़ी का छोटा सा पुल था। कई बार दोपहर में वे वहीं जाकर बैठ जाते थे और भोजन करते थे। पंद्रह जून के भंडारे से पहले एक दिन वे उसी पुल पर बैठे हुए थे कि बरेली से एक भक्त आये। ट्रक में। कुछ पत्तल और कसोरे (मिट्टी का बर्तन) साथ लाये थे भंडारे के लिए। उन्होंने वह सब वहां अर्पित करते हुए मुझसे कहा, "दादा बताइये और क्या जरूरत है?"

मेरे नहीं कहने के बाद भी वे बार बार यही जोर देते रहे कि बताइये और क्या चाहिए। बताइये और क्या चाहिए। उनके बहुत जोर देने पर मैंने कह दिया कि दो खांची (बांस का बना बड़ा बर्तन) कसोरे और भेज दीजिएगा।

तब तक बाबाजी चिल्लाये। क्या? क्या करने जा रहे हो तुम उसके साथ मिलकर? है तो सबकुछ। तुम बहुत लालची हो गये हो। कोई कुछ देना चाहे तो तुम तत्काल झोली फैला देते हो।"  मैं चुप रहा।

प्रसाद लेने के बाद जब वह व्यक्ति जाने के लिए तैयार हुआ और महाराजजी के पास उनके चरण छूने पहुंचा तो सौ रूपये का नोट निकालकर रख दिया। महाराजजी ने तत्काल वह सौ रूपये का नोट उसके सामने ही फाड़कर फेंक दिया। वह व्यक्ति बहुत खिन्न मन से वापस लौट गया।

उसके जाने के बाद महाराजजी ने कहा, "आप समझते नहीं हैं दादा। कंजूस का दिया धन या भोजन आपको स्वीकार नहीं करना चाहिए। हजम नहीं होगा। उस आदमी के पास बहुत पैसा है लेकिन दान पुण्य के लिए धेला भी खर्च नहीं करता है। मैं उसको बहुत अच्छे से जानता हूं।"

(सुधीर "दादा" मुखर्जी द्वारा अपने दोस्त को बताया गया एक वाकया।)

#महाराजजीकथामृत

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Tuesday, November 17, 2015

आंखों की रोशनी वापस आ गयी

एक बार इलाके के एक बुजुर्ग की दोनों आंखें चली गयी। उस वक्त वे बुजुर्ग महाराजजी के पास ही रह रहे थे। लोगों ने जब महाराजजी से इस बारे में बात की तो उन्होंने कहा कि "समर्थ गुरू रामदास ने अपनी मां के अंधेपन का इलाज किया था। दुनिया में ऐसा दूसरा संत नहीं है।" यह कहकर महाराजजी ने एक अनार मंगवाया और उसको मसलकर उसका जूस पी गये और उन्होंने अपने कंबल को अपने ऊपर ओढ़ लिया। उनकी आंखों से खून निकल रहा था। इसके बाद महाराजजी ने उस व्यक्ति से कहा कि तुम्हारी दृष्टि वापस आ जाए तो अपने व्यापार से रिटायर हो जाना और अपनी आध्यात्मिक उन्नति की दिशा में आगे बढ़ना।

अगले दिन डॉक्टर आये और जब उन बुजुर्ग की आंखों का परीक्षण किया तो चौंक गये। उन्होंने कहा कि यह असंभव है। किसने किया यह? लोगों ने बताया महाराजजी ने। डॉक्टर ने पूछा कि वे अब कहां हैं तो लोगों ने बताया कि वे तो जा चुके हैं। डॉक्टर भागते हुए स्टेशन पहुंचे। महाराजजी ट्रेन में सवार हो चुके थे। डॉक्टर दौड़कर बोगी में पहुंच गये। डॉक्टर को देखते ही महाराजजी ने कहा, देखो ये कितने काबिल डॉक्टर हैं। इन्होंने उस बुजुर्ग व्यक्ति की आंख ठीक कर दी। ये बहुत अच्छे डॉक्टर हैं।

हालांकि तीन चार महीने बाद ही वे बुजुर्ग अपने आपको रोक नहीं पाये और काम पर वापस लौट गये। उसी दिन उनके आंखों की रोशनी फिर से चली गयी।

#महाराजजीकथामृत

(रामदास, मिराकल आफ लव, पहला संस्करण, 1979, पेज- 318)
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🌺 कृपा करहु आवई सद्भावा!! 🌺
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Saturday, November 14, 2015

गुरु भक्ति

एक दिन मैं महाराजजी से कुछ दूरी पर उनके सामने ही बैठा हुआ था। बहुत सारे भक्त उनके आसपास बैठे हुए थे। बात हो रही थी। हंसी मजाक चल रहा था। कुछ उनके पैरों की मालिश कर रहे थे। लोग उन्हें सेव और फूल दे रहे थे। वे उन चीजों को प्रसाद रूप में लोगों में वितरित कर रहे थे। सब तरफ प्रेम और करुणा बरस रही थी। लेकिन मैदान में कुछ दूरी पर मैं अलग ही अवस्था में बैठा हुआ था।

मैं सोच रहा था कि सब ठीक है लेकिन यह सब तो एक मूर्तरूप से जुड़ा प्रेम है। मैंने यह कर लिया अब मुझे इसके परे जाना है। वे कुछ खास नहीं हैं हालांकि वे सबकुछ हैं। मैं दुनिया में जहां कहीं भी हूं, उनके चरणों में हूं। मैं उनके साथ जिस अवस्था में जुड़ा हूं उसके लिए शरीर की मर्यादा का होना जरूरी नहीं है। जागृत अवस्था में हम एक हैं।

तभी मैंने देखा कि महाराजजी एक बुजुर्ग भक्त के कान में कुछ कह रहे हैं और वह बुजुर्ग भक्त भागकर मेरे पास आया और मेरे पैर छूकर खड़ा हो गया। मैंने पूछा, "आपने यह क्यों किया?" उन्होंने कहा, "महाराजजी ने कहा है। उन्होंने कहा कि मैं और वो एक दूसरे को अच्छे से समझते हैं।"

#महाराजजीकथामृत

(रामदास, जर्नी आफ अवेकनिंग, ई बुक, पेज- १२५)
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Saturday, November 7, 2015

छूटे प्राण वापस आ गये

करीब ४० वर्ष पूर्व मेरी पत्नी बहुत बीमार हो गयी ! बचने की कोई उम्मीद नही थी ! मेरे पास एक ही रास्ता था , बाबा का निरन्तर स्मरण! जब पता चला बाबा जी बरेली डाक्टर भण्डारी के घर आये है तो वहाँ भागा पर बाबा वहाँ न मिले। आठ बजे रात पेड़ के नीचे बैठा बाबा को याद करता रहा! तब एक व्यक्ति से पता चला कि बाबा जी कमिश्नर लाल साहेब के घर पर हैं। मै वहाँ पहँचा परन्तु चपरासी ने भीतर नही जाने दिया। मैं बाहर ही महाराजजी को दीनता से अंतरमन में पुकारता रहा और तभी बाबा जी बाहर निकल आये मेरी आर्त पुकार सुनकर और कहा, "रिक्शा ला तेरे घर चलते है!"

लाल साहब की गाडी पर बाबा नही बैठे ! रिक्शे से हम घर आ गये ! बाबा सीधे मेरी पत्नी के कमरे में पहुंचे और उनके पलंग के पास ही कुर्सी पर बैठ गये ! तभी उन्होने अपने चरण उठाकर पलंग पर रख दिये। पत्नी ने प्रयास करके किसी तरह अपना सिर बाबा के चरणों पर रख दिया, इसके साथ ही उनकी रही सही नब्ज भी छूट गयी। सब हाहाकार करके रो उठे पर बाबा जी चिल्ला कर बोले, "नहीं, मरी नही है, आन्नद में है !" और ऐसा कहकर पत्नी के गाल पर चपत मारी और उसकी नब्ज वापिस आ गई। तब रात १०.३० बजे बाबा ने हिमालया कम्बल माँगा। कम्बल आ गया, जिसे बाबा जी ने खुद ओढ लिया और अपना ओढा कम्बल पत्नी पर डाल कर चले गये।

बाबा दूसरे दिन फिर आये और पत्नी की नब्ज उनके चरण छूते फिर छूट गयी! तब बाबा बोले "माई हमे बहुत परेशान करती है! हमें बैठना पड़ जाता है !" और इसके बाद पत्नी बिना इलाज के पूर्णता: स्वस्थ हो गई!

(प्यारेलाल गुप्ता -- बरेली)

जय गुरूदेव
अनंत कथामृत

Tuesday, November 3, 2015

गंगाजी में बहता है दूध

माघ मेला में महाराजजी अपने भक्तों को बताते रहते थे कि गंगा में पानी नहीं दूध बहता है। एक दिन जब महाराजजी कुछ अन्य भक्तों के साथ गंगाजी में नौका यात्रा कर रहे थे तब कुछ भक्तों ने सोचा कि क्यों न महाराजजी की बात का परीक्षण किया जाए? हालांकि उन्होंने महाराजजी से कुछ नहीं कहा लेकिन महाराजजी ने खुद उनसे कहा कि एक लोटा गंगाजल भरकर ढंक दो। जब वह गंगाजल गिलास में डाला गया तो शुद्ध दूध बन चुका था। एक भक्त ने यह चमत्कार देखा तो सोचा कि थोड़ा सा दूध वह लेकर जाएगा और मेले में दूसरे भक्तों को भी दिखायेगा लेकिन महाराजजी ने गुस्से में उसके हाथ से दूध का वह गिलास छीनकर गंगाजी में प्रवाहित कर दिया।

#महाराजजीकथामृत

(रामदास, मिराकल आफ लव, दूसरा संस्करण (1995, पेज- 114-15)

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🌺 !! कृपा करहु आवई सद्भावा !! 🌺
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